SC के फैसले से आहत कुलदीप सेंगर की बेटी इशिता का सवाल– हम कहाँ जाएँ?

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद कुलदीप सेंगर के परिवार की पीड़ा एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई है। इस फैसले से आहत उनकी छोटी बेटी इशिता सेंगर ने देश की संवैधानिक संस्थाओं से भावुक अपील करते हुए पूछा है— “हम कहाँ जाएँ?”। यह सवाल केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि न्याय, संवेदना और लोकतंत्र पर विश्वास रखने वाले हर नागरिक का है।

आठ साल का इंतज़ार और टूटता भरोसा

इशिता सेंगर के अनुसार, उनका परिवार पिछले आठ वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। बिना शोर, बिना प्रदर्शन और बिना किसी सार्वजनिक दबाव के उन्होंने कानून और संविधान पर भरोसा बनाए रखा। परिवार का मानना था कि यदि वे सही प्रक्रिया का पालन करेंगे, तो सत्य स्वयं सामने आएगा।

लेकिन समय के साथ यह भरोसा कमजोर पड़ता गया।

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पहचान का ठप्पा और इंसानियत का हनन

इशिता कहती हैं कि उनकी बात सुने जाने से पहले ही उन्हें एक पहचान में सीमित कर दिया जाता है— “एक बीजेपी विधायक की बेटी”। इस ठप्पे के साथ उनकी इंसानियत, उनके अधिकार और उनकी आवाज़ को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

सोशल मीडिया पर उन्हें लगातार नफरत, अपमान और हिंसा की धमकियों का सामना करना पड़ा। बिना तथ्य, बिना सबूत, केवल पूर्वाग्रह के आधार पर उनकी ज़िंदगी को निशाना बनाया गया।

चुप्पी की कीमत

परिवार ने कभी सड़क पर उतरकर विरोध नहीं किया।
न टीवी डिबेट्स में शोर मचाया।
न ही सोशल मीडिया ट्रेंड्स का सहारा लिया।

उन्होंने चुप्पी इसलिए चुनी क्योंकि उन्हें लगा कि सच को तमाशे की ज़रूरत नहीं होती
लेकिन इस चुप्पी की कीमत उन्हें आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से चुकानी पड़ी।

एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक,
एक पत्र से दूसरी गुहार तक,
हर दरवाज़ा खटखटाया गया—
लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

डर का माहौल और दबाव का सच

इशिता सेंगर का कहना है कि आज सबसे बड़ा खतरा सिर्फ अन्याय नहीं, बल्कि वह डर है जो समाज में फैल चुका है। ऐसा डर, जो लोगों को सच के साथ खड़े होने से रोकता है। जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई तथ्यों की बात न करे, कोई सवाल न पूछे।

उनके अनुसार, जब सबूतों और प्रक्रिया से ज़्यादा दबाव और भीड़ का शोर असर डालने लगे, तब एक आम नागरिक की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं।

“हम कोई विशेष सुविधा नहीं चाहते”

इशिता स्पष्ट करती हैं कि उनका परिवार

  • न तो किसी विशेष रियायत की माँग कर रहा है,

  • न ही पहचान के आधार पर सुरक्षा चाहता है।

उनकी एकमात्र माँग है— न्याय
क्योंकि वे भी इंसान हैं।
क्योंकि उन्हें भी गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।

संविधान से आख़िरी उम्मीद

यह पत्र एक धमकी नहीं है।
यह सहानुभूति की याचना भी नहीं है।

यह एक बेटी की अंतिम उम्मीद है—
कि कानून बिना डर के बोले,
सबूत बिना दबाव के देखे जाएँ,
और सच को सच ही माना जाए, भले ही वह असुविधाजनक क्यों न हो।

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