एक युवा के अंतर्द्वंद और उधेड़बुन की कहानी है फिल्म आजमगढ़

EROS TIMES: आतंकवाद और उससे जुड़ी अनेकों घटनाओं पर ही बॉलीवुड में दर्जनों या यूं कहें तो सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं हर फ़िल्म में किसी ना किसी घटना को सेंटर में रखकर ही कहानी का ताना बाना बुना जाता है मगर इस डेढ़ घण्टे की फ़िल्म आजमगढ़ में यह सब ना होकर सिर्फ देशभर में हो रही आतंकवादी घटनाओं को एकसूत्र में न्यूज लीड और ब्रेकिंग फुटेज के माध्यम से दिखाने की कोशिश हुई है जो कि फ़िल्म को बोरिंग बनाती है और इससे फ़िल्म की फीचर होने पर संदेह होने लगता है । प्लॉट इतना बेहतरीन था कि इस पर एक बेहद मनोरंजक फ़िल्म बन सकती थी लेकिन यहीं पर मेकर्स चूक कर गए । शायद मेकर्स शुरुआत में इसे डॉक्यूमेंट्री बनाने के चक्कर मे होंगे और फिर आज के बाजारवाद को देखते हुए इसे फीचर कैटेगरी में रिलीज करने की प्लानिंग किये होंगे । हालांकि नए शुरू हुए ott प्लेटफॉर्म मास्क टीवी के लिए आजमगढ़ एक बेहतर व्यूज लाने वाला मेटेरियल हो सकता है यदि इसके डिजिटल ब्रैंडिंग को थोड़ा और बूस्टर डोज दिया जाए तो ।अब बात आजमगढ़ में अभिनय की किया जाए तो पंकज त्रिपाठी और अनुज शर्मा ने जितना बन पड़ा है उतने में सधा हुआ अभिनय किया है । वैसे भी हिंदी सिनेमा में पंकज त्रिपाठी की ब्रांड वैल्यू एक अलग ही लेबल की है क्योंकि आज की तारीख में वे जल्दी किसी फिल्म को लेकर हाँ ही नहीं करते और ऐसे में उनकी अभिनीत किसी फिल्म के रिलीज पर पंकज त्रिपाठी के अभिनय से सम्बंधित बात ना हो तो यह सही नहीं होगा । क्योंकि आज की तारीख में पंकज त्रिपाठी गिनती की फिल्में और वेब सीरीज ही कर रहे हैं जहां उनको ध्यान में रखते हुए ही किरदारों की रचना की जाती है । शायद इसी ब्रैंड वैल्यू को भुनाने के लिए ott प्लेटफॉर्म मास्क टीवी ने फ़िल्म आजमगढ़ को रिलीज करने का बीड़ा उठाया है । अब तो यह समय ही बताएगा कि ये प्रयोग सफल रहा है या असफल । फिल्म आजमगढ़ में अभिनेता अनुज शर्मा ने एक ऐसे युवा का किरदार निभाया है जो अपने कैरियर के शुरुआती दिनों में ही ताने का शिकार होने लगता है कि उसे तो तालीम हासिल करके भी आतंकवादी ही बनना है और यही बात उस युवा के अंतर्मन में घर कर जाती है बस उसी को बदलने के लिए ही वो आतंकवादी संगठन में घुसकर दुनियाभर के आतंकवादियों को ही एक साथ खत्म कर देता है । वही मंझे हुए अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने अपने अभिनय से छोटे से ही कैरेक्टर में वो छाप छोड़ जाती हैं जिसके लिए वो जाने जाते हैं । एक ऐसे मौलवी का किरदार पंकज त्रिपाठी ने निभाया है जिसके टारगेट पर सिर्फ वो युवा मुस्लिम लड़के ही रहते हैं जो नए नए इंटर या माध्यमिक परीक्षाओं को उतीर्ण कर हायर एजुकेशन के लिए बड़े शहरों का सपना देखते हैं ऐसे युवाओं को बरगलाना और उनका ब्रेनवाश करके उन्हें आतंकवादी बनाना ही उनका पेशा रहता है । इस कार्य और रोल को बखूबी पंकज त्रिपाठी अपने किरदार के माध्यम से लोगों के सामने रखा है । इस फ़िल्म आजमगढ़ के निर्देशक कमलेश के मिश्र हैं ।

फिल्म ‘आजमगढ़’ की होर्डिंग को लेकर विवाद हुआ तो फिल्म में मौलवी की भूमिका रहे पंकज त्रिपाठी ने कहा था कि इस फिल्म में उनकी भूमिका बहुत छोटी है और फिल्म में उनके सिर्फ पांच ही सीन है। यह बात पंकज त्रिपाठी ने बिल्कुल ही सही कहा था क्योंकि फ़िल्म के प्रिव्यू में यही देखने को मिला कि पंकज त्रिपाठी का सिर्फ नाम अधिक लिया गया बल्कि फ़िल्म में उनका कैरेक्टर काफी छोटा ही दिखाई दिया ।

जहां तक फिल्म में कलाकारों के प्रदर्शन की बात होनी चाहिए तो तो पंकज त्रिपाठी अपने चिर परिचित अंदाज में ही अभिनय करते दिखे। हालांकि उनके कैरेक्टर को थोड़ा और बेहतर बनाया जा सकता था । फिल्म में उनकी भूमिका भले ही छोटी है लेकिन मेकर्स ने उन्हें मुख्य किरदार के रूप में ही प्रस्तुत किया है। फिल्म में एक युवा आमिर का चरित्र निभा रहे अनुज शर्मा ने अपने किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की है, बाकी कलाकारों का अभिनय साधारण ही रहा है।फ़िल्म के लेंथ और ब्रेकिंग न्यूज की अधिकता इसे बोरिंग ही बनाती हैं ।
ओटीटी मास्क टीवी के प्रमोटर संजय भट्ट ने फ़िल्म को अच्छी तरह से प्रोमोट किया है यही कारण है कि शायद दर्शकों का रुझान फ़िल्म की तरफ बढ़े। फिल्म ‘आजमगढ़’ की शूटिंग की बात की जाए तो इसे उत्तर प्रदेश में ही आजमगढ़ वाराणसी अलीगढ़ और दिल्ली की वास्तविक लोकेशन पर शूट की गई है। कैमरामैन महेंद्र प्रधान ने इन शहरों की खूबसूरती को बहुत ही अच्छे तरीके से अपने कैमरा में कैद करने की कोशिश किया है लेकिन कुछ और भी बेहतरीन करने की गुंजाइश बाकी रह गई है । फ़िल्म अपने मूल लेंथ से काफी लंबी है । यदि ढंग से फ़िल्म को एडिट किया गया होता तो यह फ़िल्म 40 मिनट में ही सिमट जाती जो किसी वेब सीरीज के पहले एपिसोड के माफिक ही लगता । इस छोटी लेंथ को ही खींचकर बड़ा करने के लिए इसमें आतंकवादी हमलों के फुटेज और न्यूज लीड की अधिकता का समावेश किया गया लगता है ।
फ़िल्म के बैकग्राउंड स्कोर कभी कभी आपको ठीक भी लगता है और कभी कभी इरिटेट भी करता है क्योंकि जिस तरह की फ़िल्म है उसमें बैकग्राउंड स्कोर काफी मायने रखता है  और यहां पर भी कुछ चूक हुई है । फ़िल्म में एक कव्वाली है जो कानों को थोड़ा सुकून देती है लेकिन वो भी फ़िल्म की रोचकता बना पाने में कितना सहायक होगी यह तो आने वाले समय मे ही पता चलेगा ।
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