पिंजरे में कैद पंछी का गीत: भारत में महिला सुरक्षा का भ्रम
लेखिका: देवांशी मंटा और वंशिका सिंह
“महिला को पुरुष के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है, जबकि पुरुष को महिला के संदर्भ में नहीं। पुरुष मूल विषय है, वह पूर्ण सत्ता है, जबकि महिला ‘अन्य’ है।” — सिमोन द बोउवार, द सेकंड सेक्स (1949)
एक ऐसे देश में, जहाँ महिलाओं को आज भी एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने में समाज हिचकिचाता है, वहाँ 77 साल बाद भी सिमोन द बोउवार के शब्द उतने ही प्रासंगिक हैं। भारतीय महिला की पहचान आज भी अक्सर किसी पुरुष के संदर्भ में तय की जाती है। वह मानो स्वयं की नहीं, बल्कि समाज द्वारा निर्धारित पहचान की मोहताज है। ऐसा समाज, जहाँ पुरुष को प्राथमिक और महिला को गौण माना जाता है। नतीजतन, भारतीय पुरुषवादी सोच में महिला को अक्सर केवल एक यौन वस्तु के रूप में देखा जाता है, मानो उसका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व, विचार और अस्तित्व ही न हो।
महिलाओं की सुरक्षा, लगातार हो रही बलात्कार की घटनाओं और उनके जीवन पर थोपी जा रही नैतिक पहरेदारी के खिलाफ जब महिलाएँ सड़कों पर उतर रही हैं, तब जावेद अख्तर के राज्यसभा में दिए गए 12 साल पुराने भाषण का एक वीडियो इन दिनों इंस्टाग्राम पर चर्चा में है। अपने भाषण में उन्होंने बताया था कि भारतीय समाज महिला को इंसान के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे देवी के आसन पर बैठाना पसंद करता है। इसकी वजह यह है कि देवी मान लेने पर उससे बराबरी का व्यवहार करने की जरूरत महसूस नहीं होती। लेकिन जब महिला को एक इंसान माना जाएगा, तो उसके बुनियादी मानवाधिकारों को भी स्वीकार करना पड़ेगा। उसे अपने फैसले लेने का अधिकार देना होगा। उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व, इच्छा और स्वायत्तता को मान्यता देनी होगी।
यही बात पितृसत्तात्मक सोच के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।
इस चुनौती को खत्म करने के लिए समाज महिलाओं की स्वतंत्रता पर निगरानी और नियंत्रण का एक पूरा ढाँचा तैयार करता है। इस व्यवस्था में बजरंग दल जैसे समूहों और कई राज्यों में सक्रिय तथाकथित एंटी-रोमियो दस्तों की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। ये समूह नैतिक पहरेदारी के नाम पर खुलेआम दखल देते हैं और यहाँ तक कि अपनी मर्जी से संबंध बनाने वाले वयस्क अंतरधार्मिक जोड़ों को धमकाने तक पहुँच जाते हैं। जिस व्यवस्था का उद्देश्य छेड़छाड़ और महिलाओं के उत्पीड़न को रोकना बताया गया था, वह कई बार ‘लव जिहाद’ के नाम पर सहमति से बने रिश्तों को निशाना बनाने का माध्यम बन जाती है।
जमुई की घटना के संदर्भ में मुख्य आरोपी के इंस्टाग्राम पर सैकड़ों फॉलोअर्स बढ़ने की बात सामने आई है। यह व्यवहार बेहद चिंताजनक है। जिस आचरण की सार्वजनिक निंदा होनी चाहिए, उसे कुछ लोग ‘भारतीय संस्कृति’ के रक्षक के रूप में पेश करके उसका महिमामंडन करते हैं। किसी आरोपी के प्रति इस तरह का समर्थन, जब उसके आचरण को लेकर गंभीर सवाल हों, उस सामाजिक मानसिकता को उजागर करता है जिसमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा को भी गौरव का विषय बना दिया जाता है। यही मानसिकता बलात्कार की संस्कृति (रेप कल्चर) को जन्म देती है और उसे मजबूत करती है।
रेप कल्चर का अर्थ यह नहीं है कि समाज का हर व्यक्ति बलात्कार का समर्थन करता है। इसका अर्थ उन रोजमर्रा की सोच, व्यवहार और पितृसत्तात्मक मूल्यों से है, जो यौन हिंसा की गंभीरता को कम करके आँकते हैं, अपराधियों को बहाने देते हैं और पीड़ित महिला को ही उसकी पीड़ा के लिए जिम्मेदार ठहराने लगते हैं।
जब भी किसी महिला पर हमला होता है, तो चर्चा अक्सर इस बात पर होने लगती है कि उसने क्या पहना था, वह घर से बाहर क्यों निकली थी, वह इतनी रात को वहाँ क्यों थी या उसका कोई पुरुष मित्र क्यों था। लेकिन जिस सवाल को सबसे पहले पूछा जाना चाहिए, वह अक्सर पीछे छूट जाता है—आखिर उस पुरुष ने यह क्यों मान लिया कि उसे किसी महिला की इच्छा और सहमति का उल्लंघन करने का अधिकार है?
यही वह तरीका है, जिससे रेप कल्चर खुद को बनाए रखता है और धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाता है।
इस मानसिकता को बढ़ावा देने में भारतीय राजनेताओं के गैर-जिम्मेदाराना बयानों की भी भूमिका रही है। कई बार महिलाओं के खिलाफ होने वाली गंभीर हिंसा को लड़कों की छोटी-मोटी गलती बताकर टालने की कोशिश की जाती है। कहीं पश्चिमी संस्कृति को इसका कारण ठहराया जाता है, तो कहीं महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर बाल विवाह जैसे सुझाव तक सामने आते हैं। महिलाओं को घरों के भीतर सीमित रखने को सुरक्षा का उपाय मान लिया जाता है, जबकि हिंसा की असली वजहों को समझने और उनका समाधान करने की गंभीर कोशिश नहीं की जाती।
भारत में यौन हिंसा से निपटने के लिए कानून और संस्थाएँ मौजूद हैं। लेकिन कानून में अधिकार लिखे होने का यह अर्थ नहीं है कि महिलाएँ रोजमर्रा की जिंदगी में उन अधिकारों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल भी कर सकती हैं।
कानून के मुताबिक एक महिला को कहीं भी आने-जाने, मोबाइल फोन इस्तेमाल करने, अपनी दोस्ती चुनने, अपनी पसंद से विवाह करने और स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन सामाजिक स्तर पर उसके इन फैसलों पर अक्सर शर्तें लगा दी जाती हैं। उसकी स्वतंत्रता को परिवार की इज्जत, समाज की मान्यताओं और लोगों की सोच के तराजू पर तौला जाता है।
यहीं कानून में मिले अधिकार और वास्तविक जीवन के अनुभवों के बीच का अंतर सामने आता है।
कोई कानून रातोंरात समाज की पिछड़ी मानसिकता को नहीं बदल सकता। इस बदलाव की शुरुआत बचपन से ही करनी होगी। स्कूलों के पाठ्यक्रम में शारीरिक स्वायत्तता, सहमति और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों को व्यवस्थित रूप से शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे इन मूल्यों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना सकें।
स्कूलों और कॉलेजों में लड़के-लड़कियों को अलग-अलग रखने की प्रवृत्ति भी कई बार उनके बीच स्वाभाविक संवाद और आपसी समझ विकसित होने में बाधा बनती है। जब दोनों के बीच सामान्य बातचीत और स्वस्थ मित्रता के अवसर सीमित कर दिए जाते हैं, तो एक-दूसरे के प्रति दूरी और अलगाव की भावना बढ़ सकती है। ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं को एक समान इंसान के बजाय वस्तु की तरह देखने वाली सोच को चुनौती देना और कठिन हो जाता है। बचपन से ही लैंगिक भेदभाव से जुड़ी धारणाएँ मजबूत होने लगती हैं।
इसलिए सहमति को समाज की सामान्य भाषा का हिस्सा बनाना जरूरी है।
दोस्ती का अर्थ सहमति नहीं है। कपड़ों का अर्थ सहमति नहीं है। चुप्पी का अर्थ सहमति नहीं है।
शायद अब हमें यह दोबारा सोचने की जरूरत है कि आखिर महिला सुरक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है।
यदि महिलाओं को सुरक्षित रखने के नाम पर उनकी जिंदगी को सीमित करना पड़े, उनकी आवाजाही पर रोक लगानी पड़े, उनकी दोस्ती पर सवाल उठाने पड़ें और उनकी पसंद पर पहरा बैठाना पड़े, तो हमने वास्तव में एक सुरक्षित समाज नहीं बनाया है। हमने केवल ऐसा समाज बनाया है, जहाँ महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आसपास मौजूद खतरे के अनुसार खुद को छोटा करती जाएँ।
यदि हिंसा का जवाब महिला की स्वतंत्रता छीनना है, तो उसे सुरक्षित नहीं बनाया गया है। उसे केवल कम स्वतंत्र बना दिया गया है।
महिलाओं की सुरक्षा का अर्थ उन्हें पिंजरे में बंद करना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ वे बिना डर के आजादी से जी सकें।
देवांशी मंटा ICSSR, नई दिल्ली में सीनियर रिसर्च इंटर्न हैं और वंशिका सिंह रिसर्च असिस्टेंट हैं।






