नेत्रहीनता के सभी मामलों में से 2/3 मामले महिलाओं से संबंधित

Eros Times: नोएडा अक्सर देखा गया है कि अपने परिवारों की देखभाल के चक्कर में महिलाएं अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य की उपेक्षा करती हैं, जिससे उनकी आंखें भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आंखों की रौशनी को कहीं अधिक ख़तरा होता है और नेत्रहीनता के कुल मामलों में से 2/3 मामले महिलाओं से संबंधित होते हैं. ‘इंटरनैशनल डे ऑफ़ एक्शन फॉर वूमेन्स हेल्थ’ से पहले यह कहना है नोएडा स्थित आई केयर अस्पताल की सीओओ और चिकित्सा निदेशक डॉक्टर रीना चौधरी का।

डॉ. रीना चौधरी ने कहा आंखों में रूखापन (नमी‌ की कमी) मोतियाबिंद ग्लूकोमा, उम्र संबंधी मैकुलर डिजेनेरेशन और डायबिटिक रेटीनोपैथी जैसी आंखों की आम बीमारियां महिलाओं में अधिक पाई जाती हैं. इतना ही नहीं, अमूमन पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं ज़्यादा उम्र तक जीती हैं, ऐसे में उनकी आंखों को पुरुषों की तुलना में अधिका ख़तरा बना रहता है. हॉर्मोन में होने वाले बदलाव, माइग्रेन और अन्य शारीरिक बदलावों से भी महिलाओं की आंखों पर दुष्प्रभाव पड़ता है. महिलाओं द्वारा नियमित रूप से नेत्र परीक्षण की उपेक्षा करना बहुत ही आम बात है. वे समय के अभाव, घर की तमाम ज़िम्मेदारियों को संभालने और घर के बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के चलते अक्सर नेत्र चिकित्सकों के पास जांच के लिए  जाने से कतराती हैं. ऐसे में महिलाओं को नेत्र संबंधी ख़तरों के बारे में आग़ाह करना और आंखों में किसी तरह की समस्या पाये जाने पर समय पर इलाज के लिए उन्हें प्रेरित व मानसिक रूप से तैयार करना बेहद ज़रूरी हो जाता है.”

डॉक्टर का कहना है कि महिलाओं को आसपास के पर्यावरणीय ख़तरों से भी अच्छी तरह से अवगत होना चाहिए और ऐसे में अपने आंखों का पूरा ख़्याल रखना चाहिए. वे कहती हैं, “लम्बे समय तक आंखों पर पड़नेवाली सूरज की रौशनी से कैटरैक्ट और उम्र संबंधी मैकुलर डिजेनेरेशन का बड़ा ख़तरा बना रहता है. ऐसे में इससे बचाव के लिए आंखों पर UV सुरक्षा से लैस सनग्लास और सिर पर कैप और हेट का पहनना धूप से बचाव का उत्तम तरीका है. प्रदूषण भी आंखों के रूखेपन‌ और एलर्जिक कंजंक्टिविटिस के  सबसे बड़े कारण होते हैं. ऐसे में आंखों में आई ड्रॉप्स डालकर उन्हें नियमित रूप से साफ़ करने की ज़रूरत होती है. आंखों पर पड़नेवाले ऐसे दुष्प्रभावों से आंखों की रौशनी को गंभीर रूप से ख़तरा होता है. ऐसे में महिलाओं को घर का काम करने के दौरान सुरक्षा के लिहाज़ से चश्मा अथवा प्रभावी किस्म के शील्ड का इस्तेमाल करना चाहिए. बागबानी संबंधी कार्य करने के दौरान, एक-दूसरे से संपर्क में आने वाले खेल या फिर ऐसे काम करना जहां आसपास कचरा उड़ रहा हो, चिंगारियां निकल रही हों या फिर किसी तरह का रसायन निकलता दिखाई दे; इस तरह के काम करने के दौरान आंखों पर चश्मा पहनना बेहद आवश्यक हो जाता है. आंखों को बार-बार मलने से आंखों की रौशनी कम होती है और इससे कॉर्निया का आकार भी बदल जाता है. ऐसे में इससे बचना ही बेहतर होता है.

यौवनारम्भ, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति के दौरान हॉर्मोन में होने वाले बदलावों से महिलाओं की आंखों पर पड़ने वाले असर के बारे में बात करते हुए डॉक्टर रीना चौधरी ने कहा, “यौवनारम्भ के दौरान लड़कियों की आंखों के स्वास्थ्य पर लगातार बुरा असर पड़ता है. ऐसे में आंखों की नियमित जांच कराना बेहद ज़रूरी हो जाता है. गर्भावस्था और रजनोनिवृत्ति को हमेशा से महिलाओं की आंखों के स्वास्थ्य के लिए ख़तरे के तौर पर देखा जाता रहा है. इसमें आंखों की रौशनी और नमी का कम होना शामिल है.”

डॉक्टर के मुताबिक, मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, आंखों में रूखापन और मैकुलर डिजेनेरेशन जैसी उम्र संबंधी बीमारियां भी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक पाई जाती हैं. ऐसे में पौष्टिक आहार के साथ-साथ नियमित रूप से व्यायाम करना और अच्छी नींद लेना इस तरह के ख़तरों को कम करने में सहायद सिद्ध होता है. इनमें से किसी भी तरह की समस्या पाए जाने पर आंखों की नियमित रूप से जांच कराना और समय पर आंखों का इलाज कराने को सबसे अच्छे उपाय के तौर पर देखा जाता है.

डॉ. रीना चौधरी आगे कहती हैं, “आज की तारीख़ में डिजिटल विज़न सिन्ड्रोम का ख़तरा तेज़ी से बढ़ता जा रहा है. इससे आंखों में रूखापन आता है और आंखों की तंत्रिकाओं पर अत्याधिक दबाब पड़ता है, जिससे आंखें कमज़ोर हो जाती हैं और आंखों की सतह के आकार में बदलाव होता है. रजोनिवृत्ति जैसे उम्र संबंधी हॉरमोनल बदलावों से महिलाओं पर इस तरह का ख़तरा अधिक मंडराता है. इसके लिए 20-20-20 का‌ नियम कारगार सिद्ध होता है. इसमें 20 मिनट तक लगातार स्क्रीन पर देखने के बाद 20 फ़ुट पर रखी किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखने‌ और इस तरह से आंखों को 20 सेकंड का का ब्रेक देने की सलाह दी जाती है. इससे आंखों को ज़रूरी आराम मिलता है. चश्मे में ब्लू लाइट फ़िल्टर के इस्तेमाल से डिजिटल स्क्रीन के आंखों पर‌ पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है. बार-बार आंखों का मूंदना और आई ड्रॉप्स के रूप में नकली आंसुओं के इस्तेमाल से भी आंखों को ख़ूब राहत मिलती है. गर्म पानी में भिगोये गये तौलिए को आंखों पर दबाकर रखने से नेत्र तंत्रिकाओं को राहत का‌ एहसास होता है और आंसुओं‌ का उचित मात्रा में निर्माण भी होता है, जिससे आंखों का रूखापन कम हो जाता है

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