राज्य विधायिकाओं के परित विधेयकों पर राज्यपाल/उपराज्यपाल के फैसले लेने की तय हो समय सीमा- अरविंद केजरीवाल

तमिलनाडु विधानसभा के पारित संबंधित प्रस्ताव पर वहां के मुख्यमंत्री स्टालिन को पत्र लिखकर सीएम अरविंद केजरीवाल ने दी बधाई 
आगामी सत्र में दिल्ली विधानसभा भी ऐसा ही प्रस्ताव परित कर राज्य विधायिकाओं से पारित प्रस्ताव पर फैसले लेने की समय सीमा तय करने की मांग करेगी
 गैर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपाल/उपराज्यपाल संविधान के संघीय ढांचे की धज्जियां उड़ा रहे हैं और जानबूझ कर विधेयक को लंबित किया जा रहा है 
हम गैर भाजपा शासित राज्य सरकारों की शक्तियों को हड़पने के लिए केंद्र और उसके प्रतिनिधियों की कार्रवाई की निंदा करते हैं 
अब समय आ गया है कि हम देश को बताएं कि यह देश केंद्र सरकार और उसके प्रतिनिधियों से नहीं बल्कि कानून के शासन से शासित है
EROS TIMES: अरविंद केजरीवाल ने राज्य विधायिकाओं द्वारा परित विधेयकों पर राज्यपालों या उपराज्यपालों के निर्णय लेने की समय सीमा तय करने पुरज़ोर समर्थन किया है। उन्होंने तमिलनाडु विधानसभा में इसी तरह की मांग का प्रस्ताव परित करने पर वहां के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को पत्र लिखकर बधाई दी है। साथ ही कहा है कि आगामी सत्र में दिल्ली विधानसभा भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित करेगी जिसमें राष्ट्रपति और केंद्र सरकार से राज्य विधायिकाओं से पारित विधेयकों पर फैसले लेने की समय सीमा तय करने की मांग की जाएगी। सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि गैर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपाल या उपराज्यपाल संविधान के संघीय ढांचे की धज्जियां उड़ा रहे हैं और वहां की विधायिकाओं से पारित विधेयकों को जानबूझ कर लंबित रख रहे हैं। उन्होंने इसका विरोध करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि हम देश के सामने यह उजागर करें कि भारत केंद्र सरकार और उसके प्रतिनिधियों से नहीं, बल्कि कानून के शासन से शासित है।
तमिलनाडु के सीएम स्टालिन को लिखे पत्र में अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि यह सर्वविदित है कि भारत में लोकतंत्र पर रोजाना हमला हो रहा है। हमारे संविधान में दिए गए स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व समेत हर सिद्धांत से समझौता किया जा रहा है। निःसंदेह हमारा संघीय ढांचा देश के सबसे दूरस्थ कोने में बैठे लोगों को मताधिकार देता है। जो ताकतें संविधान में दी गई शक्तियों को अवैध रूप से केंद्रीकृत करना चाहती हैं, उनसे हमारे संघीय ढांचे को भी गंभीर खतरा है।
उन्होंने पत्र में कहा है कि हमारे संघीय ढांचे और भारत के संविधान में केंद्र व राज्य सरकारों की स्पष्ट रूप से निर्धारित भूमिकाएं और जिम्मेदारियां तय है। जब हमने औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की थी, तब विखंडन की तमाम आशंकाओं के बावजूद राष्ट्र और समाज एकजुट बना रहा।यह निराशाजनक है कि वर्तमान में इन सिद्धांतों और नीतियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। गैर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपाल/उपराज्यपाल विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों या दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) द्वारा भेजी गई फाइलों को अनिश्चित समय के लिए रोक रहे हैं। यह न केवल संविधान का उल्लंघन है, बल्कि जनता के जनादेश का भी अपमान है जो किसी भी लोकतंत्र में सर्वोच्च होता है।
अरविंद केजरीवाल ने आगे लिखा है कि दिल्ली में हम जिस स्थिति का सामना कर रहे हैं, वह और भी बदतर है। हालात ये हैं कि उपराज्यपाल दिल्ली विधानसभा के लोकतांत्रिक जनादेश में लगातार हस्तक्षेप कर रहे है। एलजी ने दिल्ली के बजट को पेश करने से रोका और लगातार कामकाज में बाधा पहुंचा रहे हैं। जीएनसीटीडी एक्ट में संशोधन की आड़ में उपराज्यपाल हर क्षेत्र के कामकाज में बाधा डाल रहे हैं। हमारी सरकार स्वास्थ्य सेवा शिक्षा पानी बिजली  उद्योग वित्त या बुनियादी ढांचे में बड़े कदम उठाना चाहती है, लेकिन इसमें लगातार अड़ंगा डाला जा रहा है।
अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि राज्य सरकारों और उनके राज्यपालों/उपराज्यपालों का हस्तक्षेप प्रभावी रूप से युद्ध का मैदान बन गया है। एक तरह से केंद्र सरकार द्वारा मौन युद्ध छेड़ा जा रहा है। राज्यपाल/उपराज्यपाल जानबूझकर लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई राज्य सरकारों को कमजोर कर रहे हैं और प्रशासन को अपनी सनक और पसंद के अनुसार बाधित कर रहे हैं। वे केंद्र और गैर भाजपा सरकारों द्वारा संचालित राज्यों के बीच दूरी बढ़ाने का एक चेहरा बन गए हैं। राज्य सरकारों द्वारा इसके मूल सिद्धांत का सम्मान करने के बावजूद उन्होंने सहकारी संघवाद के आदर्श को एक मौखिक सेवा प्रदान की है। परिणाम स्वरूप लोगों ने राज्यपाल/उपराज्यपाल के कार्यालय की भूमिका पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह स्वयं ही कानून है। अब समय आ गया है कि हम स्पष्ट रूप से इस बात को उजागर करें कि भारत केंद्र सरकार और उसके प्रतिनिधियों से नहीं, बल्कि कानून के शासन द्वारा शासित है।
अरविंद केजरीवाल ने पत्र के अंत में कहा है कि मैं तमिलनाडु विधानसभा की सराहना करता हूं कि उसने केंद्र सरकार और भारत के राष्ट्रपति से विधायिका द्वारा पारित विधेयकों पर फैसले लेने के लिए राज्यपालों को एक समय सीमा तय करने का आग्रह करते हुए प्रस्ताव पारित किया है और इन केंद्रीकृत प्रवृत्तियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। इसी तरह मैं भी आगामी सत्र में दिल्ली विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश करूंगा, जिसमें केंद्र से राज्यपालों या उपराज्यपालों को राज्य विधायिका की ओर से पारित विधेयकों पर फैसले लेने की समय सीमा तय करने का आग्रह किया जाएगा। हमें सामूहिक रूप से राज्य व केंद्र शासित राज्य सरकारों को खत्म करने की किसी भी कार्रवाई का विरोध करना चाहिए।
अरविंद केजरीवाल ने तमिलनाडु के सीएम एम.के. स्टालिन को लिखे पत्र को ट्वीट कर कहा ‘हम गैर भाजपा शासित राज्य सरकारों की शक्तियों को हड़पने और बाधित करने के लिए केंद्र और उसके प्रतिनिधियों की कार्रवाई की निंदा करते हैं। मैं श्री एम.के. स्टालिन के प्रयासों का समर्थन करता हूं। हम दिल्ली विधानसभा में भी एक प्रस्ताव पेश करेंगे जिसमें केंद्र से राज्यपालों/उपराज्यपालों विधेयकों पर फैसले लेने की एक समय सीमा तय करने का आग्रह किया जाएगा।
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