समारोह में देश की कला जगत की विधान जनों ने अपने विचार रखे।
EROS TIMES: यह सेमिनार भारतीय इतिहास अनुसंधान संस्था एलआईसी के सहयोग से संपन्न हुआ दिव्यांग बच्चो की प्रस्तुति रही उन्होंने देवी स्तोत्र को स्वरों से बांधा अतिथिगणों में रमेश चंद्र गौड़,मनोज श्रीवास्तव,संगीत नाटक अवॉर्डी, रंजुमोनू सैकिया सत्रीय नर्तकी, डॉक्टर शैलेश श्रीवास्तव, मनोज श्रीवास्तव ने बताया की इतिहास समय की तरंग है, हमारी नश्वरताओं का साक्षी। कला अमरता की ओर छलाँग है. कला काल को अतिलंघित करती है. आखिर कला मृत्यु के विरुद्ध कवच है. इतिहास समय में डूब जाता है, लेकिन कला में समय जब तैरता रहता है।
कथक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ संस्था की सचिव ने कहा ऐसे कार्यक्रम समाज में भारतीय कला को अपनी पहचान देते है युवा को भी मार्गदर्शन मिलता है।
इतिहास हमारी मर्त्य प्रकृति का रिमाइंडर बार बार हमें भेजता है। कला महाकाल से उत्पन्न हुई हमारी परंपरा में यों ही नहीं बताई गई. पुराणों में एक दिलचस्प कथा आती है. कहते हैं कि एक बार देवताओं को मृत्यु ने देख लिया, तब देवता भयभीत हो गये और ब्रह्मा के पास जाकर कहने लगे कि हमें मृत्य ने देख लिया है, आप कोई उपाय बताये जिसमे हम मृत्यु से बच सके, तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा कि छंद की शरण में चले जाओ, छंद को ओढ लो. वो छन्द को देवताओं का वसन कहने की जो ज्ञान -परंपरा है, उसका उत्स इसी कथा में है. कला इटर्निटी है, इतिहास पानी केरा बुदबुदा।
महाकाल नटराज है, विष्णु मोहिनी के अवतार में नृत्य का जादू जगाते हैं, सरस्वती वीणा सुनाती हैं, गणेश मृदंग बजाते हैं, कृष्ण बाँसुरी. एक ओर नटवर की रासलीला है, दूसरी ओर नटराज का लास्य और तांडव जिनसे प्रसिद्ध नृत्यांगना मार्था ग्राहम के नृत्य की contraction और release गतियों को दृष्टि मिलती है. सृष्टि का आविर्भाव और तिरोभाव. वे कितने कलाप्रेमी लोग रहे होंगे जिन्हों ने सृष्टि को एक कॉज्मिक डांस की तरह देखा. वे कितने कला प्रेमी लोग रहे होंगे जिन्हों ने सृष्टि को एक छंद कहा. याद करें ऐतरेय ब्राह्मण के प्रणेता ऐतरेय महीदास का कथन : छन्दोमयं विश्वम. ऐसी परंपरा वाली संस्कृति को भी भगवतशरण उपाध्याय जैसों के मुख से यह सुनना पड़ा कि हड़प्पा सभ्यता के बाद वैदिक उदासीनता के कारण अगले डेढ़ हजार वर्षों तक कला के क्षेत्र में कोई विशेष उन्नति देखने में नहीं आती, जबकि स्वयं अपने भरत मुनि नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में ही कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस लिया. संस्था के अध्यक्ष मनीष कुलश्रेष्ठ ने बताया दिव्यांग बच्चो को सीखना मंच देना स्कॉलरशिप देना ही संस्था का उद्देश जो विगत 10 वर्षों से कार्यत्त है।






