मैं ओम राउत को यह फिल्म बनाने के लिए इसी उत्तर की श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।-राजेश बैरागी

Eros Times: कहां से प्रारंभ करुं भाषा और बोली की समस्या के कारण मैंने न तो वाल्मीकि रामायण पढ़ी है और न तुलसीकृत रामचरितमानस ही बांच पाया। परंतु मैंने कहीं यह भी नहीं पढ़ा कि राम और लक्ष्मण का उनके पूरे जीवनकाल में एलियंस के साथ युद्ध हुआ था। आदिपुरुष फिल्म की शुरुआत ऐसे ही दृश्यों से होती है। फिर रावण बना पात्र सीता बनी पात्र का छल से अपहरण कर लेता है। जैसे ही रावण पर्दे पर आता है, डेरा प्रमुख याद आ जाता है।समूची फिल्म में वह रावण बन ही नहीं पाता, डेरा प्रमुख ही बना रहता है। फिल्मकार ने उसे राबर्ट वाड्रा,क्षमा करें, ठठेरा तक बना डाला।वह अपनी आयुध निर्माण इकाई में तलवार को हथौड़े से पीटकर तैयार करता रहता है। विभीषण अपने देश लंका को बचाने के लिए भाई से विद्रोह कर शत्रु राम से जा मिलता है। फिल्म देखने के दौरान हनुमान बने पात्र से हमेशा गुटखा खाकर पीक थूकने का भय बना रहता है।

अधिकांश संवाद स्तरहीन ही नहीं हैं, घटिया होने की सीमा लांघ गए हैं। सुषेण वैद्य को एलिमिनेट कर दिया गया है और मूर्छित लक्ष्मण की चिकित्सा विभीषण की पत्नी को सौंप दी गई है। फिल्म सुनी हुई रामकथा को अपने तरीके से लेकर चलती है। सदियों से स्थापित और भारतीयों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी रामायण को इस प्रकार विकृत रूप में प्रस्तुत करने का क्या उद्देश्य हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर फिल्म में ही कई स्थानों पर मिलता है। फिल्म के प्रारंभ में की गई उद्घोषणा में गलतियों के लिए कपटपूर्ण तरीके से क्षमा मांगी गई है।अंत से पहले अपनी वानर सेना को राम के द्वारा दिलाई गई शपथ कि ‘आगे बढ़ो और अहंकार के सीने में भगवा ध्वज गाड़ दो’ से स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म के बनाने का असल उद्देश्य क्या है। फिल्म में एक स्थान पर लक्ष्मण हनुमान से एक प्रश्न पूछते हैं कि एक तोते के दो बच्चे हैं। नदी पार करने के बाद एक बच्चा कहता है कि हम चारों पार हो गये। बच्चा ऐसा क्यों कहता है? हनुमान जी उत्तर देते हैं कि बच्चा तो कुछ भी बोल सकता है। मैं फिल्म के निर्देशक ओम राउत को यह फिल्म बनाने के लिए इसी उत्तर की श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

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