Eros Times: नोएडा। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुए छह साल हो चुके हैं, अभी भी उद्यमी-व्यापारियों की दुश्वारियां कम नहीं हो पाई हैं। जीएसटी ने कारोबार को आसान बनाने की बजाय जटिल बना दिया है। सरकार ने वादा किया था कि गलती के लिए उद्यमी-व्यापारियों की मदद की जाएगी, समस्याओं का समाधान निकाला जाएगा। मगर सरकार अपने वादे को भूल रही है। व्यापारी-उद्यमियों की गलतियों को दंड, अपराध और पेनाल्टी में बदलकर परेशानी बढ़ा दी गई है। लघु उद्योग भारती नोएडा के पूर्व महासचिव सत्यवीर सिंह ने राज्य जीएसटी विभाग की एडिशनल कमिश्नर अदिति दुहान को ज्ञापन सौंपकर इस समस्या को प्रमुखता से उठाया।
लघु उद्योग भारती नोएडा के पूर्व महासचिव सत्यवीर सिंह ने ज्ञापन के माध्यम से अवगत कराया कि उद्यमी-व्यापारियों को 2017-18 में पोर्टल के माध्यम से टैक्स में अंतर के नोटिस जारी किए जा रहे हैं। पोर्टल पर किसी नोटिस का रिप्लाई देने के लिए जो समय प्रदान किया जाता है और उसके अगले दिन पोर्टल बंद कर दिया जाता है। जीएसटी जुलाई 2017 से लागू की गई थी। नवीन कर प्रणाली के संबंध में पूर्ण जानकारी उद्यमियों एवं व्यापारियों को नहीं थी। साथ ही, अधिकारियों एवं कर विशेषज्ञों को भी पूर्ण जानकारी नहीं थी। इसके साथ ही जीएसटी के नियमों में अनेकों बार बदलाव किए गए। ऐसी विषम परिस्थितियों में न्यूनाधिक कमियां होना स्वाभाविक था। जबकि उद्यमियों का किसी भी कर देयता से बचने का कोई आशय नहीं था। परंतु इतने वर्षों के उपरांत अब नोटिस जारी करना न्याय संगत नहीं है।
ज्ञापन के माध्यम से उन्होंने मांग उठाई कि वर्ष 2017-18 के लिए सुधार के लिए एक और मौका दिया जाए। दंड, अपराध और पेनाल्टी के प्रावधानों को खत्म किया जाए। 10 हजार रुपये तक अगर कोई देयता बनती है तो पेनाल्टी के स्वरूप को खत्म किया जाए। देयता बनती है तो एफडी पर दिए जाने वाले ब्याज के अनुरूप ही ब्याज दर निर्धारित की जाए। उद्यमी-व्यापारियों की गलतियों को दंड, पेनाल्टी अपराध में समायोजित नहीं किया जाना चाहिए। उद्यमिता-व्यापार देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, इसको संजो कर रखा जाए ना कि ध्वस्त करने का काम किया जाए। जीएसटी को व्यापारी वर्ग ने सहर्ष स्वीकार किया है तो उद्यमी-व्यापारी हित में गलतियों का समाधान सरकार को खोजना चाहिए। सरकार को अपनी कथनी और करनी में फर्क नहीं करना चाहिए।






