नई दिल्ली:
पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने हाल ही में देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और सार्वजनिक जीवन में बढ़ती कटुता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “ये बीमार लोग हैं, नफ़रत में झुलसी हुई लाशें हैं, जिनको जेल में होना चाहिए था, वो आज वक्त के हाकिम बने बैठे हैं।” अदीब का यह बयान ऐसे समय आया है जब सोशल मीडिया पर कुछ पुराने और हालिया वीडियो क्लिप्स को लेकर राजनीतिक बहस तेज़ है। इन वीडियो में कथित तौर पर नफ़रत भरी भाषा और हिंसा को बढ़ावा देने वाले बयान दिखाए जाने का दावा किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अदीब के बयान को उत्तराखंड के कोटद्वार और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से जुड़े वीडियो संदर्भों से जोड़कर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो क्लिप्स में कथित तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुसलमानों, के खिलाफ अत्यंत आपत्तिजनक भाषा और गोली मारने जैसी हिंसक अभिव्यक्तियों का जिक्र होने का दावा किया गया है। हालांकि, इन वीडियो की समय-सीमा, संदर्भ और प्रामाणिकता को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं और आधिकारिक पुष्टि को लेकर बहस जारी है।

मोहम्मद अदीब ने अपने बयान में किसी नेता का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे कुछ लोग समाज को बाँटने वाली भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके अनुसार, लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन नफ़रत और हिंसा की भाषा किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकती। अदीब ने यह भी कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी कहीं अधिक होती है और उनके शब्द समाज पर गहरा असर डालते हैं।
कोटद्वार से जुड़े कथित वीडियो को लेकर उत्तराखंड की राजनीति में भी हलचल देखी जा रही है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि यदि किसी सार्वजनिक मंच से हिंसा भड़काने वाले बयान दिए गए हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष के नेताओं का कहना है कि वीडियो क्लिप्स को संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है और राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम फैलाया जा रहा है।
इसी तरह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से जुड़े पुराने वीडियो और बयानों को लेकर भी समय-समय पर विवाद खड़े होते रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस तरह की भाषा समाज में डर और ध्रुवीकरण पैदा करती है। दूसरी ओर, सरकार समर्थकों का तर्क है कि मुख्यमंत्री ने हमेशा कानून के दायरे में रहकर बयान दिए हैं और उनके शब्दों को गलत अर्थों में प्रस्तुत किया जा रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सार्वजनिक बयान का मूल्यांकन उसके पूरे संदर्भ, मंच और समय के आधार पर होना चाहिए। यदि कोई बयान वास्तव में हिंसा के लिए उकसाता है या किसी समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाता है, तो भारतीय दंड संहिता और आईटी कानूनों के तहत कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है। साथ ही, अदालतों ने भी कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है और वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और सुरक्षा के अधीन है।
इस पूरे घटनाक्रम पर नागरिक समाज की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपील की है कि राजनीतिक मतभेदों को नफ़रत की भाषा में नहीं बदला जाना चाहिए। उनका कहना है कि चुनावी माहौल में बयानबाज़ी स्वाभाविक है, लेकिन नेताओं को संयम और जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए।
निष्कर्षतः, मोहम्मद अदीब का बयान एक बार फिर इस सवाल को केंद्र में ले आता है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा क्या होनी चाहिए। कोटद्वार और असम से जुड़े कथित वीडियो ने इस बहस को और तेज़ कर दिया है कि क्या नफ़रत और हिंसा की अभिव्यक्तियों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए और कैसे राजनीतिक विमर्श को लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप रखा जाए। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित मामलों पर जांच और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं किस दिशा में आगे बढ़ती हैं।






