रक्षाबंधन त्योहार का महत्व राखी बांधने की पद्धति एवं इस त्योहार का महत्व

Eros Times: सावन पूर्णिमा (इस वर्ष 30 अगस्त) के दिन आने वाले रक्षाबंधन त्यौहार के दिन बहन अपने भाई की आरती उतारकर (औक्षण करके) प्रेम के प्रतीक स्वरूप राखी बांधती है । भाई अपनी बहन को कुछ भेंट देकर, उपहार देकर उसे आशीर्वाद देता है। हजारों वर्षों से चले आ रहे रक्षाबंधन त्यौहार के पीछे का इतिहास, शास्त्र, राखी बांधने की पद्धति एवं इस त्योहार का महत्व इस लेख के माध्यम से बताया गया है। 

इतिहास: पाताल के राजा बलि को देवी लक्ष्मी ने राखी बांध कर उन्हें अपना भाई बनाया एवं भगवान नारायण को स्वतंत्र कराया, वह दिन सावन पूर्णिमा का था।

12 वर्षों तक इंद्र एवं दैत्य में युद्ध चला। अपने 12 वर्ष अर्थात उनके 12 दिन के युद्ध में  इंद्र थक गए एवं दैत्य हावी हो रहे थे। इंद्र उस युद्ध से स्वयं की प्राण रक्षा कर के पलायन करने के लिए तैयार थे। इंद्र की यह व्यथा सुनकर इंद्राणि गुरु के शरण गईं। गुरु बृहस्पति ने ध्यान लगाकर इंद्राणी से कहा यदि ‘आप अपने पतिव्रत बल का प्रयोग करके यह संकल्प करें कि मेरे पति देव सुरक्षित रहें  एवं इंद्र की दाहिनी कलाई पर एक धागा बांधें तो इंद्र युद्ध जीत जाएंगे । ‘इंद्र विजयी हुए एवं इंद्राणी का संकल्प साकार हुआ।

भविष्य पुराण में बताए अनुसार रक्षाबंधन यह मूलतः राजाओं के लिए था । राखी की एक नई पद्धति इतिहास काल से प्रारंभ हुई।

भावनात्मक महत्व : राखी, बहन भाई के हाथ (कलाई) में बांधती है एवं उसके पीछे भाई का उत्कर्ष (प्रगति) हो एवं भाई बहन की रक्षा करें ,यह भूमिका होती है। बहन द्वारा भाई को राखी बांधने से अधिक महत्वपूर्ण है कोई युवक /पुरुष किसी युवती या स्त्री से राखी बंधवाए। इस कारण उनका विशेषतः युवक एवं पुरुषों का युवती अथवा स्त्री की तरफ देखने का दृष्टिकोण बदलता है।

राखी बांधना : चावल, सोना एवं सफेद राई पुड़िया में एकत्र बांधने से रक्षा अर्थात राखी सिद्ध होती है । वह रेशमी धागे से बांधी जाती है।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे माचल माचलः।।

 अर्थ: महाबली एवं दानवेंद्र बलि राजा जिससे बद्ध हुआ, उस रक्षा से मैं तुम्हें भी बांधती हूं । इस राखी से तुम्हारा सदैव रक्षण हो । हे राखी, तुम अटूट रहना ।


चावल के दानों का समुच्चय राखी के रूप में रेशमी धागे से बांधने की पद्धति क्यों है? चावल सर्वसमावेशक का प्रतीक अर्थात सभी को अपने में समा लेने वाला है तथा वह सभी तरंगों का उत्तम आदान-प्रदान करने वाला है। (सुप्रवाहक है)। चावल के दानों का समुच्चय सफेद वस्त्र में बांधकर वह रेशमी धागे से शिव स्वरूप जीव के दाहिने हाथ में बांधना एक प्रकार से सात्विक रेशमी बंधन सिद्ध करना है । रेशमी धागा सात्विक तरंगों का गतिशील संचालन करने हेतु (बहुत अच्छा है) प्रभावी है।

बहन एवं भाई के बीच के लेन-देन का हिसाब समाप्त होने में सहायता होना – बहन एवं भाई इनमें साधारणतया 30% लेन-देन का हिसाब होता है। लेन-देन का हिसाब रक्षाबंधन जैसे त्योहारों के माध्यम से कम होता है। अर्थात वे स्थूल रूप में एक दूसरे के बंधन में बंधते हैं, परंतु सूक्ष्म रूप से एक दूसरे से लेन-देन का हिसाब समाप्त कर रहे होते हैं । प्रत्येक वर्ष बहन एवं भाई का लेन-देन का हिसाब कम होने के प्रतीक स्वरूप राखी बांधी जाती है । भाई बहन इन्हें आपसी लेनदेन का हिसाब कम करने के लिए यह एक अवसर होता है और इस अवसर का लाभ दोनों जीवों द्वारा उठाना चाहिए।

बहन ने भाई को राखी बांधते समय कैसा भाव रखना चाहिए? – भगवान श्री कृष्ण की उंगली से होने वाले रक्त प्रवाह को रोकने के लिए द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़ कर उनकी उंगली में बांधा था । बहन भाई को होने वाला कष्ट कभी भी सहन नहीं कर सकती । उस पर आया हुआ संकट दूर करने के लिए वह कुछ भी कर सकती है । राखी पूर्णिमा के दिन प्रत्येक बहन  द्वारा भाई को राखी बांधते समय यही भाव रखना चाहिए।

रक्षाबंधन के दिन बहन द्वारा कोई भी अपेक्षा न रखकर राखी बांधने का महत्व – रक्षाबंधन के दिन बहन द्वारा भाई से वस्तु के रूप में किसी भी उपहार की अपेक्षा मन में रखने पर वह उस दिन मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ से वंचित रह जाती है। यह दिन आध्यात्मिक रूप से लेन देन का हिसाब न्यून करने के लिए होता है। अपेक्षा रख कर उपहार प्राप्त करने पर लेन-देन का हिसाब 3 गुना बढ़ जाता है।

भाई द्वारा सात्विक उपहार देने का महत्व – असात्विक उपहार रज, तम, प्रधान होता है । इसलिए भाई अपनी बहन को सात्विक उपहार दें। सात्विक उपहार अर्थात कोई भी धार्मिक ग्रंथ जप की माला ऐसी वस्तुएं जिससे बहन को साधना करने में सहायता होगी।

प्रार्थना करना – बहन द्वारा भाई के कल्याण के लिए एवं भाई द्वारा बहन की रक्षा के लिए प्रार्थना करने के साथ ही भाई बहन दोनों ने ‘राष्ट्र-धर्म की रक्षा के लिए हमारे द्वारा प्रयास होने दीजिए ‘ऐसी ईश्वर को प्रार्थना करनी चाहिए।

राखी के माध्यम से देवताओं की अवमानना रोकिए – आजकल राखी पर ओम अथवा देवताओं के चित्र होते हैं। त्योहार के बाद राखी के उपयोग के बाद वे यहां वहां पड़े रहते हैं । इससे एक तरह से देवता एवं धार्मिक प्रतीक चिन्ह का अनादर होता है । यह रोकने के लिए राखी का पानी में विसर्जन कीजिए।

संदर्भ :सनातन संस्था का ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव, एवं व्रत 

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