अस्तित्व का संकट बनाम सत्ता और शक्ति का संघर्ष – अनुज अग्रवाल

Eros Times: दुनिया इन दिनों विचित्र त्रासदियों से गुजर रही है। कुछ जगह जो रास्ते, सभ्यता के ढाँचे (घर, दुकान, सड़क आदि आदि) उसने धरती की हरियाली को  मिटाकर बनाए थे उसे बाढ़ और बारिश मिटाने पर तूली है तो कुछ जगह भीषण गर्मी उस हरियाली को ही जलाने पर उतारू है और दुनिया के अनेक देशों के जंगलों में लगी आग महीनों से बुझने का नाम ही नहीं ले रही। दशकों से सूख चुकी नदीयो में आयी बाढ़ आधी दुनिया में तबाही और भीषण जल प्रलय जैसे हालात पैदा कर चुकी है। मात्र पिछले चार पाँच वर्षों में ही धरती का तापमान .2 डिग्री बढ़ चुका है और जुलाई 23 पिछले एक लाख से भी अधिक वर्षों में धरती का सबसे गर्म वर्ष घोषित हो गया है। “ग्लोबल वार्मिंग” अब “ग्लोबल बॉयलिंग” में बदल चुकी हैं किंतु इस नष्ट होती सभ्यता और प्रकृति के बीच उबलती दुनिया के लोगों की बुद्धि ही कुंठित हो भ्रमित हो गयी है। अत्यधिक जनसंख्या, अधिकतम मानवीय गतिविधियों और जीवाश्म ईंधन के अतिशय प्रयोग ने हर व्यक्ति के सुख चैन और स्थिर जीवन की संभावनाओ को लीलना शुरू कर दिया है। विकास और जीडीपी की होड़ की सीमाए बाज़ार व लालची व्यवस्थाओं ने बेतरह तोड़ मरोड़ दी हैं और इस अनियंत्रित दोहन से प्रकृति व विकास का संतुलन बिगड़ चुका है। निर्धारित मानक यह है कि “जितना प्रकृति का दोहन उतना पुनरुत्पादन” किंतु व्यवहार में इसके ठीक उलट हो रहा है और इसी कारण जितनी जीडीपी देशों और दुनिया की प्रतिवर्ष बढ़ती है उससे ज़्यादा का नुक़सान “ग्लोबल बॉयलिंग” कर दे रही है। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदो का स्पष्ट आँकलन है कि यह नुक़सान हर दिन के साथ बढ़ता जाना है इसलिए सरकारों और कारपोरेट दोनों को अपनी नीति और मानसिकता बदलनी ही होगी किंतु उनकी जिद पूरी मानवीयता और प्रकृति को संपूर्ण विनाश की और ले जा रही है । ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि यह सदी मानव की अंतिम सदी न हो जाए। 

इतनी विकट परिस्थितियों के बीच भी दुनिया रुस – अमेरिका (यूक्रेन) युद्ध से दो चार है और अमेरिका – नाटो देश व वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम दुनिया  में अपने वर्चस्व को बनाए रखने की हर संभव कोशिशों में है और दुनिया को चौथी औद्योगिक क्रांति की ओर धकेल रहा है। खाद्यान्न व चारे के उत्पादन में निरंतर होती कमी, घटते जंगल, जीव -जंतु और जलचर कैसे और कब तक आठ सौ करोड़ मानवों को ज़िंदा रख पाएँगे यह बड़ी चुनौती है। हर दिन बदलते मौसम ने कृषि व मौसम वैज्ञानिको के हर शोध, दावे व भविष्यवाणी को तोड़मरोड़ के रख दिया है और इस अनियंत्रित मौसम ने जीवन के अस्तित्व पर ही बड़े प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं।पिघलते ग्लेशियर और  उबलते सागर इतनी वर्षा कर रहे हैं कि पृथ्वी जलप्रलय की ओर बढ़ चुकी है। भारत में हिमालय पर हो रहा विध्वंश इसका गवाह है। हर व्यक्ति इसे महसूस कर भी रहा है और विनाश निकट जान ईश्वर की आराधना व धार्मिक स्थलों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ता जा रहा है । किंतु अंधी व्यवस्थाएँ और सरकारे जो अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कठपुतली हो चुकी हैं अपना बाज़ारूपन नहीं छोड़ रही हैं। अंधाधुंध और अनियंत्रित विकास और जनता को भरमाने के लिए नित नए नाटक, उपद्रव, पंगे, ड्रामे और मीडिया स्टोरी व ब्रेकिंग न्यूज़।  

देश में व  दुनिया में हर क़ीमत पर व हर परिस्थितियों में लोकतंत्र के नाम पर चुनाव करवाए जा रहे हैं।अमेरिका और चीन – रुस दोनों गुट हर देश में अपने अपने पक्ष की सरकार बनाने के लिए हर संभव खेल खेल रहे है। अनेक देशों में आंतरिक संघर्ष, उथल पुथल, हिसा व संघर्ष इसी खेल का नतीजा हैं। भारत में भी मणिपुर तो ताज़ा संकट इसी कुटिल खेल का एक उदाहरण है। कई जगह पर पुरानी तो कहीं नई राजनीतिक पार्टी सरकार बना रही है।

भारत में भी 26 बनाम 38 का इंडिया बनाम भारत (एनडीए) गढ़जोड़ आमने सामने है तो तीसरा मोर्चा तटस्थ दलों का है किंतु देश वि विश्व जिन चुनौतियों से जूझ रहा है उनसे मुक़ाबला करने की कोई दिशा, चिंतन व रणनीति किसी के पास नहीं और जो शिक्षा प्रणाली इसको सिखाना चाहती है उसे ही ख़ारिज किया जा रहा है।भारतीय संस्कृति व जीवन दर्शन हमेशा प्रकृति केंद्रित विकास की बात करता है किंतु जितनी इसकी चर्चा इन दिनों हो रही है उतना ही वास्तविक जीवन से यह ग़ायब होता जा रहा है। जनता की वास्तविक आवश्यकताओ, चुनौतियों, आशंकाओं व अपेक्षाओं से ये सभी दल दूर हैं। जन से दूर ये जनार्दन अहम, सत्ता व वर्चस्व के संघर्ष में इस कदर उलझ चुके हैं कि मानवता की वास्तविक चुनौती व समस्याओं को समझने व उनका निदान करने का माद्दा ही खो चुके हैं या फिर वे समझ चुके हैं कि धरती तो अब डूबता जहाज है और इसकी बीमारी इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि इसका कोई इलाज ही नहीं बचा। ऐसे में लोगों को उलझाए रखो और फँसाए रखो।

बाज़ार, उत्तेजना, मादक द्रव्य, पोर्न, धर्म, जाति, भाषा , नस्ल आदि के मुद्दे इसी सोच की उपज हैं। सत्तायें और राजनेताओ को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि विकास के विकार अब मानव को लीलना प्रारंभ कर चुके हैं और अगर निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो अगले कुछ दशकों में भीषण जनहानि हो सकती है। क्योंकि वे जानते हैं कि हर व्यक्ति का सबसे बड़ा स्वप्न व महत्वाकांक्षा किसी भी क़ीमत पर शक्ति व वर्चस्व प्राप्त करने का होता है इसलिए चाहे कितनी भी जनहानि क्यों न हो जाए,जब तक अंतिम दो व्यक्ति भी धरती पर रहेंगे सत्ता और शक्ति का संघर्ष चलता रहेगा मूल मुद्दे हमेशा पीछे रहेंगे।

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